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गरीबी का तमाशा और 5 किलो का मृगतृष्णा

गरीबी का तमाशा और 5 किलो का मृगतृष्णा
भारत आज़ाद हुए 79 साल हो गए, पर नेताओं की दुकान अब भी “गरीबी” पर ही चल रही है। असलियत यह है कि देश में गरीबी अब रही ही नहीं — हाँ, भ्रष्टाचार ज़रूर गरीबी के नाम पर मोटरसाइकिल चलाता घूम रहा है।
आज का मजदूर बाइक से मज़दूरी करने जाता है, गाँव का किसान मोबाइल पर ऑनलाइन पेमेंट लेता है। शहर-कस्बों में “गरीब” अब सिर्फ़ राशन कार्ड की लाइनों में दिखाई देते हैं। क्यों? क्योंकि सरकार ने जनता के दिमाग में यह घुसेड़ा है कि “तुम गरीब हो, इसलिए तुम्हें मुफ्त का राशन, मुफ्त का वजीफ़ा और मुफ्त का तमाशा मिलेगा।”
नेता जानते हैं कि अगर जनता आत्मनिर्भर हो गई तो न रैली में भीड़ जुटेगी, न धरने में ताली बजेगी। इसलिए गांधी का “आत्मनिर्भर भारत” सपना नहीं, नेताओं का “आश्रित भारत” अजेंडा हकीकत है।
स्कूलों में शिक्षा की जगह मिड-डे मील और वजीफ़े पर ज़्यादा चर्चा होती है। माता-पिता भी पूछते हैं – “आज क्या खाना मिला?” – न कि “आज क्या पढ़ाया गया?”। शिक्षा की हत्या और पेट की राजनीति में नेता माहिर हो गए हैं।
असल गरीब अगर कोई हैं तो वे जंगलों में रहने वाले आदिवासी भाई-बहन। पर बाकी जनता गरीबी नहीं, बल्कि मुफ्तखोरी का प्रमाणपत्र लेकर घूम रही है।
सरकारें जानती हैं – जितना पैसा विकास पर लगना चाहिए, उतना “बंदरबांट” में खर्च हो रहा है। यही वजह है कि भ्रष्टाचार अब अत्याचार में बदल चुका है।
भारत को गरीब कहना अब सबसे बड़ा झूठ है। असली बीमारी गरीबी नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार है। जिस दिन सरकार “गरीबी रेखा” का नाटक बंद कर, असल गरीब को पहचानकर उनकी मदद करेगी — उस दिन भारत वाकई आत्मनिर्भर होगा।
तब तक नेता 5 किलो राशन से जनता को “गरीब” होने का एहसास कराते रहेंगे और जनता लाइन में खड़ी होकर इस तमाशे को “जीवित लोकतंत्र” मानती रहेगी।
भूपेंद्र सिंह
(9589659253)

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